क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अब जोखिम भरा काम होता जा रहा है? क्या जनता के सामने सच रखने की कोशिश करने वाले पत्रकारों को अपने सवालों की कीमत हिरासत में देकर चुकानी पड़ेगी? दिल्ली से सामने आई पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरों ने एक बार फिर प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति के अधिकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा समेत अन्य पत्रकारों को कथित तौर पर घसीटकर बसों में बैठाए जाने और हिरासत में लिए जाने की तस्वीरें सामने आने के बाद यह मामला चर्चा में है। घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के पालन पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, संबंधित आदेश का विवरण, कार्रवाई की परिस्थितियां और हिरासत के कानूनी आधार की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
जब कैमरा सच दिखाए और सवालों पर पहरा लगने लगे…
पत्रकार का काम केवल घटनाओं को कैमरे में कैद करना नहीं, बल्कि उन सवालों को भी सामने लाना है, जिनके जवाब जनता जानना चाहती है। लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि सत्ता, प्रशासन और व्यवस्था से जवाबदेही मांगना नागरिक अधिकारों की रक्षा का एक अहम हिस्सा है।
लेकिन यदि किसी पत्रकार को अपना काम करते समय हिरासत में लिए जाने या दुर्व्यवहार का सामना करना पड़े, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उसे स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने का पर्याप्त अवसर मिला? क्या कार्रवाई कानून के अनुरूप थी? और क्या संबंधित पत्रकारों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया गया?
इन सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि तथ्यों, निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई से सामने आना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सवाल, जवाबदेही किसकी?
यदि संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट का कोई स्पष्ट आदेश लागू होता है और कार्रवाई में उसका उल्लंघन हुआ है, तो यह गंभीर विषय है। ऐसे में आदेश की वास्तविक शर्तों, पुलिस की कार्रवाई और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच जरूरी है। कानून लागू करने वाली एजेंसियों की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी कानून का पालन करने वाले प्रत्येक नागरिक की।
कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन कार्रवाई की वैधता, आवश्यकता और तरीका भी सवालों से परे नहीं हो सकते। पत्रकार होने मात्र से किसी को कानून से छूट नहीं मिलती, लेकिन पत्रकारिता के अधिकारों को भी बिना उचित आधार के सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र में सवालों की जगह बनी रहनी चाहिए
लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों और संस्थाओं तक सीमित नहीं होती। इसकी असली कसौटी यह भी है कि नागरिक और पत्रकार बिना अनुचित दबाव के सवाल पूछ सकें, तथ्यों को सामने रख सकें और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर रिपोर्टिंग कर सकें।
आज मामला केवल एक पत्रकार या एक घटना का नहीं, बल्कि उस भरोसे का भी है, जिस पर जनता और मीडिया के बीच संबंध टिके हैं। यदि किसी पत्रकार के साथ नियमों के विरुद्ध कार्रवाई हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। वहीं, यदि पुलिस के पास कार्रवाई का कोई वैधानिक आधार है, तो उसे भी तथ्यों के साथ सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
आखिर सवाल यही है—जब सवाल पूछने वाले पत्रकारों की कार्रवाई पर ही सवाल उठने लगें, तो जवाबदेही सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
याद रखना होगा कि पत्रकारिता का उद्देश्य किसी के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि तथ्यों को सामने लाना है। लोकतंत्र में असहमति, सवाल और जवाबदेही के लिए जगह बनी रहना जरूरी है। क्योंकि सवालों से मजबूत होने वाला लोकतंत्र ही जनता का भरोसा कायम रख सकता है।

अनूप शर्मा
नई दिल्ली
