पत्रकार को गाली देने, मारपीट कर बस में ले जाने और कमर में गंभीर चोट पहुंचाने का दावा; डिजिटल पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार ने खड़े किए बड़े सवाल

क्या अब वर्दी से सवाल पूछना भी पत्रकारों के लिए खतरे से खाली नहीं रहा? क्या लोकतंत्र में सवाल पूछने की कीमत गाली, मारपीट और चोट के रूप में चुकानी पड़ेगी? राजधानी दिल्ली में पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार से जुड़े आरोपों ने एक बार फिर प्रेस की स्वतंत्रता, पुलिस की जवाबदेही और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।

आरोप है कि आईपीएस प्रशांत चौधरी ने सवाल पूछने पर एक पत्रकार के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और उसके साथ मारपीट की। यह भी दावा किया जा रहा है कि पत्रकार को बस में ले जाकर फेंक दिया गया, जिससे उसकी कमर में गंभीर चोट आई। इसके अलावा, दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान डिजिटल पत्रकारों को निशाना बनाने, हिरासत में लेने और उनके साथ कथित मारपीट के आरोप भी सामने आए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना आवश्यक है।

सवाल से परहेज या जवाबदेही से बचने की कोशिश?

पत्रकार का काम केवल खबरें लिखना या कैमरे के सामने घटनाओं का ब्योरा देना नहीं है। उसका दायित्व उन सवालों को उठाना भी है, जिनके जवाब जनता जानना चाहती है। जब कोई पत्रकार किसी अधिकारी से सवाल करता है, तो वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि आम नागरिकों की जिज्ञासाओं और अधिकारों के लिए भी आवाज उठाता है।

ऐसे में यदि सवाल पूछने पर कथित गाली-गलौज और मारपीट का सामना करना पड़े, तो यह चिंता केवल एक पत्रकार तक सीमित नहीं रहती। सवाल उठता है कि क्या ऐसी घटनाएं पत्रकारों के मन में भय पैदा करेंगी? क्या कैमरे के सामने सच दिखाने वाले लोग अगली बार सवाल पूछने से पहले अपनी सुरक्षा के बारे में सोचने को मजबूर होंगे?

खाकी का अधिकार अपनी जगह, कानून की मर्यादा अपनी जगह!

पुलिस के कंधों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी है। भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा व्यवस्था और कानून का पालन सुनिश्चित करना पुलिस के कर्तव्यों का हिस्सा है। लेकिन कानून लागू करने का अधिकार भी कानून की सीमाओं के भीतर ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

यदि किसी पत्रकार ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन किसी भी व्यक्ति के साथ कथित दुर्व्यवहार या अनुचित बल प्रयोग को केवल सरकारी पद या वर्दी के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता।

वर्दी का सम्मान जरूरी है, लेकिन वर्दी की जिम्मेदारी और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।

कैमरा खामोश हुआ तो सवाल कौन पूछेगा?

आज डिजिटल मीडिया ने पत्रकारिता को नई ताकत दी है। छोटे-छोटे मोबाइल कैमरों के जरिए स्थानीय घटनाओं से लेकर बड़े जनहित के मुद्दों तक को जनता के सामने लाया जा रहा है। ऐसे पत्रकारों के सामने यदि कथित दुर्व्यवहार, हिरासत या शारीरिक हमले का खतरा खड़ा होता है, तो इसका असर केवल मीडिया पर नहीं, बल्कि जनता तक सूचना पहुंचने की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।

लोकतंत्र में असहमति, सवाल और आलोचना के लिए जगह होना आवश्यक है। किसी सवाल से असहमति हो सकती है, किसी रिपोर्ट पर आपत्ति भी जताई जा सकती है, लेकिन उसका जवाब तथ्यों, नियमों और कानून के माध्यम से दिया जाना चाहिए।

अब जवाबदेही किसकी?

इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच कौन करेगा? क्या कथित घटना से जुड़े वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जांच होगी? क्या संबंधित पत्रकार को अपनी बात रखने का उचित अवसर मिलेगा? और यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो क्या जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी?

इन सवालों का जवाब मिलना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि पुलिस और मीडिया दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग हैं। इनके बीच विश्वास और जवाबदेही बनी रहना जनता के हित में है।

लोकतंत्र में सवालों पर पहरा नहीं, जवाबदेही होनी चाहिए!

पत्रकार कोई कानून से ऊपर नहीं है, लेकिन पत्रकार होने के कारण उसके साथ कानून से परे जाकर व्यवहार भी नहीं किया जा सकता। यही सिद्धांत हर नागरिक पर लागू होता है। निष्पक्ष जांच, पारदर्शिता और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई ही ऐसे विवादों का उचित समाधान है।

आखिर सवाल पूछना अपराध कब से हो गया? यदि पत्रकारों को सवाल पूछने के लिए डरना पड़े, तो सत्ता और व्यवस्था से जवाब मांगने की लोकतांत्रिक परंपरा कमजोर हो सकती है। इसलिए जरूरत किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आरोपों की सच्चाई सामने लाने, जिम्मेदारी तय करने और यह सुनिश्चित करने की है कि कानून की रक्षा करने वाले तंत्र पर भी कानून का समान रूप से पालन करने की जिम्मेदारी बनी रहे।

क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत केवल वर्दी, सत्ता या अधिकार में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में होती है जहां सवाल पूछने की आजादी और कानून के प्रति सम्मान साथ-साथ कायम रहें।

अनूप शर्मा

नई दिल्ली

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *