हे भारत माता, तुम्हें प्रणाम।
तुम्हारी गोद में जन्म लेने वाला प्रत्येक पुत्र और पुत्री गर्व से स्वयं को भारतीय कहता है। तुम्हारी सभ्यता ने दुनिया को करुणा, सत्य, अहिंसा और न्याय का मार्ग दिखाया। पर आज तुम्हारे एक चिंतित पुत्र के रूप में यह पत्र लिखते हुए मन में अनेक प्रश्न और पीड़ाएं हैं।
मां, जब बाजार में रोजमर्रा की वस्तुएं आम आदमी की पहुंच से दूर होने लगें, जब मेहनतकश परिवार अपनी आय और खर्च के बीच बढ़ती खाई से जूझने लगें, तब केवल आंकड़ों की चमक लोगों के जीवन का अंधकार दूर नहीं कर सकती। अर्थव्यवस्था का वास्तविक अर्थ तब है जब नागरिक सम्मानपूर्वक जीवन जी सके, न कि केवल रिपोर्टों में विकास दिखाई दे।
मां, सबसे अधिक वेदना तब होती है जब तुम्हारी बेटियां सुरक्षित नहीं महसूस करतीं। किसी भी सभ्यता की वास्तविक पहचान उसके मंदिरों, स्मारकों या गगनचुंबी इमारतों से नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा से होती है। जब बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध अपराध की खबरें सामान्य होने लगें, तब यह केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि समाज की आत्मा पर लगा घाव होता है।
मां, लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का सौंदर्य असहमति में है। यदि विपक्ष की आवाज को शत्रु की तरह देखा जाए, आलोचना को अपराध समझा जाए और प्रश्न पूछने वालों को संदेह की दृष्टि से देखा जाए, तो लोकतंत्र का शरीर भले जीवित दिखाई दे, उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है। सत्ता और विपक्ष लोकतंत्र के दो पहिए हैं; एक को कमजोर कर देने से राष्ट्र की यात्रा संतुलित नहीं रह सकती।
मां, अपराध तब नहीं बढ़ते जब केवल अपराधी बढ़ते हैं; अपराध तब बढ़ते हैं जब न्याय का भय घटने लगता है और व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास होता है। जब नागरिक स्वयं को असुरक्षित और असहाय महसूस करने लगें, तब विकास के बड़े-बड़े दावे भी अधूरे प्रतीत होते हैं।
मां, इतिहास सिखाता है कि कोई भी राष्ट्र केवल आर्थिक शक्ति से महान नहीं बनता। वह तब महान बनता है जब उसके नागरिक न्याय, समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा का अनुभव करें। राष्ट्र केवल भूमि का टुकड़ा नहीं होता; राष्ट्र उन मूल्यों का नाम है जिन पर वह खड़ा होता है।
आज आवश्यकता किसी दल, नेता या विचारधारा की जीत की नहीं, बल्कि संविधान की भावना, सामाजिक न्याय, महिला सुरक्षा, आर्थिक समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की है। क्योंकि जब जनता मजबूत होती है, तभी राष्ट्र मजबूत होता है।
हे भारत माता, प्रार्थना है कि तुम्हारे सभी पुत्र-पुत्रियों में सत्य बोलने का साहस, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का संकल्प और एक बेहतर भारत बनाने की चेतना जागृत हो। क्योंकि राष्ट्रभक्ति केवल जयकारों में नहीं, बल्कि राष्ट्र की कमियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने के प्रयास में भी निहित होती है।
©~ गिरीश भारद्वाज
(प्रदेश मीडिया कोऑर्डिनेटर हरियाणा कांग्रेस कमेटी)
बल्लभगढ़ विधानसभा क्षेत्र-88

फरीदाबाद, हरियाणा।
मोहित सक्सेना।
