डीएसपी सौम्या अस्थाना द्वारा पत्रकारों की वीडियोग्राफी पर पाबंदी लगाने और मुकदमा दर्ज करने की चेतावनी पर इंडियन कौंसिल ऑफ प्रेस द्वारा कड़ी निन्दा : नरेश शर्मा
इंडियन कौंसिल ऑफ प्रेस के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष नरेश शर्मा ने उत्तर प्रदेश पुलिस के मेरठ जनपद में डीएसपी सौम्या अस्थाना के तुगलकी फरमान पर नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा कि यह वर्दी की हठधर्मिता है या लोकतंत्र का गला घोंटने की साज़िश या फिर डीएसपी को पत्रकारों से जलन या डर है? उत्तर प्रदेश में पुलिस प्रशासन एवं लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के बीच टकराव की स्थिति चरम पर पहुंच गई क्योंकि मेरठ की डीएसपी सौम्या अस्थाना द्वारा कथित तौर पर थानों में पत्रकारों द्वारा वीडियोग्राफी करने पर पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करने की चेतावनी ने एक बहुत बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष नरेश शर्मा ने इसे मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और डीजीपी उत्तर प्रदेश के उन आदेशों की अवहेलना बताया है जिनमें पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे। क्या पुलिस थानों में कुछ छिपा रही है या फिर कोई नियमविरुद्ध कार्य कर रही है?उन्होंने कहा कि यदि थानों की कार्यप्रणाली पारदर्शी है तो पुलिस को कैमरे से डर क्यों लग रहा है क्या थानों के भीतर ऐसी संदिग्ध गतिविधियां हो रही है जिन्हें जनता की नजरों से बचाना जरूरी है इंडियन कौंसिल ऑफ प्रेस की मांग है कि मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की जगह उत्तर प्रदेश सरकार पहले थानों के कोने-कोने में लगे सीसीटीवी कैमरों की निष्पक्ष जांच कराएं कि वे काम कर रहे है या नही
कानून बनाम मौखिक आदेश संविधान की धज्जियां पत्रकारों के संगठन इंडियन कौंसिल ऑफ प्रेस ने इस फरमान को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है जो प्रेस की स्वतंत्रता का मूल आधार है।
पुलिस थाना एक सार्वजनिक कार्यलय है कोई निजी निवास नहीं जनहित में यहां की स्थिति दिखाना अपराध नही बल्कि पत्रकार का दायित्व है।
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट स्पष्ट कर चुके है कि पत्रकार को बिना किसी को बिना किसी वैध और ठोस कानूनी कारण के सूचना संकलन से नही रोका जा सकता क्योंकि प्रेस का साफ़ मतलब है पब्लिक रिलेटेड इमरजेंसी सोशल सर्विस फिर पत्रकार को अपना काम करने से रोकने का तात्पर्य क्या है?


