– लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, वह निरंतर सवालों, संवाद और जवाबदेही से जीवित रहता है। इस पूरी प्रक्रिया में यदि कोई वर्ग सबसे अधिक सजग, सक्रिय और संवेदनशील भूमिका निभाता है, तो वह है पत्रकार। यही कारण है कि पत्रकार को केवल पेशेवर नहीं, बल्कि बुद्धिजीवी वर्ग का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। पत्रकार की सोचने-समझने की क्षमता आम नागरिक से अलग और व्यापक इसलिए होती है क्योंकि वह समाज को एक नहीं, अनेक दृष्टिकोणों से देखने को विवश होता है। उसे हर खबर के पीछे छिपे कारण, प्रभाव और परिणाम को समझना पड़ता है। वह घटनाओं को केवल घटते हुए नहीं देखता, बल्कि यह भी परखता है कि उनका समाज, शासन और भविष्य पर क्या असर पड़ेगा। एक पत्रकार का दिन सत्ता के गलियारों से शुरू होकर गांव की पगडंडियों तक जाता है। कभी उसे किसान की पीड़ा समझनी होती है, कभी मजदूर की मजबूरी, कभी महिला की असुरक्षा, तो कभी आदिवासी, दलित और वंचित समुदाय की अनसुनी आवाज़। यही बहु-भूमिकाएं उसे समाज का सबसे बड़ा पाठक और सबसे गहरा अध्येता बनाती हैं। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यूं ही नहीं कहा गया। जब विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उसे लागू करती है और न्यायपालिका न्याय सुनिश्चित करती है, तब पत्रकारिता इन तीनों पर निगरानी रखती है। सत्ता जब निरंकुश होने लगती है, तब पत्रकार सवाल खड़े करता है। जब सच दबाया जाता है, तब पत्रकार जोखिम उठाकर उसे सामने लाता है।भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में पत्रकार की भूमिका और भी चुनौतीपूर्ण है। यहां समाज के हर वर्ग, हर भाषा, हर क्षेत्र की सच्चाई अलग है। पत्रकार को इन सबको समझते हुए सत्य को सरल, निष्पक्ष और निर्भीक रूप में प्रस्तुत करना होता है। यही कारण है कि एक पत्रकार औसतन सबसे अधिक पढ़ता है, सबसे अधिक सीखता है और सबसे अधिक सोचता है। आज जब सूचना का शोर बढ़ गया है और भ्रम को सच की तरह परोसा जा रहा है, तब जिम्मेदार पत्रकारिता की जरूरत पहले से कहीं अधिक है। क्योंकि पत्रकार केवल खबर नहीं लिखता वह जनमत गढ़ता है, चेतना जगाता है और लोकतंत्र को जीवित रखता है। पत्रकार सत्ता का प्रचारक नहीं, जनता का प्रहरी होता है। और जब तक यह प्रहरी जागता रहेगा, तब तक लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा।

रिपोर्ट : एन के सिन्हा

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